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॥ हरि नाम संकीर्तन (महा मंत्र) ॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

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🌸 हरे कृष्ण महा मंत्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे . .

चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम् ।

श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम् ॥

आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् ।

सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम् ॥

भावार्थ (हिंदी):

श्रीकृष्ण का संकीर्तन (हरे नाम का जप) हृदय के दर्पण को साफ करता है और संसार रूपी महा अग्नि को शांत करता है। यह जीवन में शुभता रूपी चन्द्रमा की किरणों को फैलाता है और आत्मा को वास्तविक ज्ञान देता है। यह आनंद के सागर को बढ़ाता है, हर क्षण अमृत का अनुभव कराता है और आत्मा को पूर्ण रूप से शुद्ध करता है।

॥ शिक्षाष्टकम् ॥

॥ शिक्षाष्टकम् ॥

१.

चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम् ।

श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम् ॥

आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् ।

सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम् ॥

भावार्थ:

श्रीकृष्ण का संकीर्तन हृदय के दर्पण को शुद्ध करता है, संसार रूपी अग्नि को शांत करता है, जीवन में मंगल और ज्ञान का प्रकाश फैलाता है तथा आत्मा को परम आनंद से भर देता है।

२.

नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः ।

एतादृशी तव कृपा भगवन् ममापि दुरदैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥

भावार्थ:

हे प्रभु! आपने अपने अनेक नामों में अपनी सारी शक्तियाँ रख दी हैं और उनके जप के लिए कोई नियम भी नहीं रखा, फिर भी मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे उनमें प्रेम नहीं हो रहा।

३.

तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना ।

अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥

भावार्थ:

मनुष्य को घास से भी अधिक विनम्र, वृक्ष से भी अधिक सहनशील, सम्मान की इच्छा बिना और दूसरों को सम्मान देने वाला होना चाहिए—तभी वह हरि का सदा कीर्तन कर सकता है।

४.

न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये ।

मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥

भावार्थ:

हे प्रभु! मुझे न धन चाहिए, न अनुयायी, न सुंदर स्त्री; मैं तो केवल जन्म-जन्म तक आपकी निष्काम भक्ति चाहता हूँ।

५.

अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ ।

कृपया तव पादपङ्कजस्थितधूलीसदृशं विचिन्तय ॥

भावार्थ:

हे नन्दनंदन! मैं आपका सेवक होकर भी इस संसार रूपी समुद्र में गिर गया हूँ, कृपा करके मुझे अपने चरणों की धूल के समान स्थान दें।

६.

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदरुद्धया गिरा ।

पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति ॥

भावार्थ:

हे प्रभु! आपका नाम लेते समय मेरी आँखों से आँसू बहें, वाणी रुक जाए और शरीर रोमांचित हो—ऐसा समय कब आएगा?

७.

युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम् ।

शून्यायितं जगत्सर्वं गोविन्दविरहेण मे ॥

भावार्थ:

हे गोविन्द! आपके विरह में एक क्षण भी युग के समान लगता है, आँखों से आँसू वर्षा की तरह बहते हैं और यह संसार शून्य प्रतीत होता है।

८.

आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मां अदर्शनान्मर्महतां करोतु वा ।

यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः ॥

भावार्थ:

चाहे प्रभु मुझे अपनाएँ या त्याग दें, दर्शन दें या न दें—वे जैसे भी व्यवहार करें, वे ही मेरे प्राणनाथ हैं, और कोई नहीं।

॥ हरे कृष्ण महा मंत्र ॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

भावार्थ:

हे श्रीकृष्ण और श्रीराम! कृपया हमें अपनी भक्ति में लगाएँ और हमें संसार के बंधनों से मुक्त करें।

॥ हरि नाम संकीर्तन (महा मंत्र) ॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥